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बृहत्संहिता • अध्याय 55 • श्लोक 28
करकोन्मिश्रमृदि तत्क्षणजन्मकम् । फलभारान्विता शाखा भवतीति किमद्भुतम् ॥
वह उसी क्षण उत्पन्न हो जाता है तथा उसकी शाखा फलों के भार से शुक जाती है। इसमें किसी प्रकार का आश्चर्य नहीं करना चाहिये अर्थात् ऐसा निश्चित ही होता है।
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