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बृहत्संहिता • अध्याय 55 • श्लोक 24
हस्तायतं तद्विगुणं गभीरं खात्वावटं प्रोक्तजलावपूर्णम् । शुष्कं प्रदग्धं मधुसर्पिषा तत् प्रलेपयेद् भस्मसमन्वितेन ॥
इस तरह प्रतिदिन एक मास तक करता रहे और बाद में उस बीज को बो दे। एक हाथ व्यास वाला वृत्त के आकार का दो हाथ गहरा एक गड्डा खोद कर उसको पूर्वकचित रीति से दूधमिश्रित जल से पूर्ण करे।
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