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बृहत्संहिता • अध्याय 55 • श्लोक 26
उप्तं च बीजं चतुरङ्गुलायो मत्स्याम्भसा मांसजलैश्च सिक्तम्। वल्ली भवत्याशु शुभप्रवाला विस्मापनी मण्डपमावृणोति ॥
जब तक कि वह कठिन न हो जाय। इसके पश्चात् उस पर चार अंगुल नीचे पूर्व में सिद्ध किया हुआ कैथ काबीज रोप कर मछली और मांस के जल से सींचे तो शीघ्र ही सुन्दर पत्तों से युत, मण्डप को ढकने वाली वल्ली उत्पन्न हो जाती है।
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