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बृहत्संहिता • अध्याय 55 • श्लोक 20
मांससूकरवसासमन्वितं रोपितं च परिकर्मितावनौ । क्षीरसंयुतजलावसेचितं जायते कुसुमयुक्तमेव तत् ॥
के मांस की धूप देने के बाद मांस और सूकर की चों- सहित उस बीज को तिल बोकर शुद्ध की हुई भूमि में लगाकर दुग्धमिश्रित जल से सींचे तो निश्चित ही फूलयुत वृक्ष उत्पन्न होता है।
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