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बृहत्संहिता • अध्याय 55 • श्लोक 29
श्लेष्मातकस्य बीजानि निष्कुलीकृत्य भावयेत् प्राज्ञः । अङ्कोलविज्जलाद्धिश्छायायां सप्तकृत्वैवम् ॥
बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि छिलका उतारे हुए लसोड़े के बीज को अङ्कोलफल के भीतर के जल से भावना देकर छाया में सुखाता जाय।
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