शतशोऽङ्कोलसम्भूतफलकल्केन भावितम् । एततैलेन वा बीजं श्लेष्मातकफलेन वा ॥
अङ्कोल वृक्ष के फल के कल्क या तेल से अथवा श्लेष्मातक (लसोड़े) के फल, कल्क या तेल से सौ बार भावना देकर ओलों से भीगी हुई मिट्टी में जिसे बीज को बोया जाता है
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