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अध्याय 33 — अथोल्कालक्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
30 श्लोक • केवल अनुवाद
स्वर्ग में शुभ फल भोग कर गिरते हुये प्राणियों का स्वरूप उल्का है। धिष्ण्या, उल्का, अशनि, बिजली, तारा-ये पाँच उल्का के भेद हैं।
उल्का १५ दिन में, धिष्या १५ दिन में, अशनि तीन पक्ष (पैंतालीस दिन) में, बिजली छः दिन में और तारा भी छः दिन में फल देती है
तारा पल का चतुर्याश, पिण्या फाल का आधा दया विद्युत्, उल्का, अरानि-ये तोसे सम्पूर्ण फत्त को देती है।
अशनि अधिक शब्द करती हुई, पृथ्वी को विदारण करती हुई और चक्र की तरह भ्रमण करती हुई मनुष्य, हाथी, घोड़ा, मृग, पत्थर, घर, वृक्ष या पशुओं पर गिरती है।
विद्युत् प्राणियों में भय उत्पन्न करती हुई, तट-तट (तर-तर) शब्द करती हुई, कुटिल और विस्तृत शरीर बाली, प्राणियों या काष्ठ राशियों पर प्रज्वलित होकर बहुत जल्दी गिरती है ।
धिष्ण्या पतली और छोटी पूँछ वाली, प्रज्वलित अग्नि के समान, दो हाथ लम्बी तथा दश धनुष प्रमाण प्रदेश के बीच में अधिक दिखाई देती है।
तारा एक हाथ लम्बी, चेत, ताम्र या कमलसूत्र के समान (अति सूक्ष्म) आकाश में आकृष्ट होती हुई, तिरछी, नीचे और ऊपर की तरफ जाती है।
उल्का विशाल शिर बाली, पुरुष के प्रमाण तुल्य (साढ़े तीन हाथ) लम्बी और गिरती हुई बढ़ती है। इसके अनेक प्रकार के भेद हैं।
यह प्रेत, शत्र, गदहा, ऊँट, नाक, बन्दर, दंष्ट्री (सूअर आदि), हल, मृग, गोह, साँप, धूम के समान या दो शिर वाली होती है। ये सब पाप फल देने वाली होती हैं।
ध्वज, मत्स्य, हाथी, पर्वत, कमल, चन्द्रमा, घोड़ा, तपी हुई धूलो, हंस, श्रीवृक्ष (नारियल), वज्र ( हीरा या शत्र), शंख या स्वस्तिक (राजगृह की तरह) रूप वाली उल्का दिखाई दे तो लोगों का कुशल और सुभिक्ष करती है ।
आकाश मध्य में बहुत तरह की होकर गिरती हुई उल्का राजा और राष्ट्र के नाश के लिये होती है तथा जो उल्का आकाश में बार-बार भ्रमण करती है, यह लोगों की विपत्ति को व्यक्त करती है।
जो उल्का सूर्य या चन्द्र को स्पर्श करती है अथवा सूर्य या चन्द्र से निकल कर भूकम्प करती हुई गिरती है, वह दूसरे राजा का आगमन, राजभय, दुर्भिक्ष करती है। और अवृष्टि योल्का चन्द्रार्थी शशिसूयों संस्पृशती। ती संस्पृशति । तद्विसृता वा ताभ्यां चन्द्रा कर्काभ्यां विसृता निर्गता। सभूप्रकम्पा च भूकम्पसहिता। तस्याः पतमानाया भूकम्पमुत्पद्यते। सा तथाभूला परचक्रागमं परचक्रस्यागमनम्। नृपभयं राजभयम्। दुर्भिक्षभयम्। अवृष्टिभयं च जनयत्युत्पादयति ।
यदि उल्का सूर्य और चन्द्रमा के प्रदक्षिण क्रम से गमन करे तो क्रम से पुर में रहने बाले और बाहर रहने वाले का नाश करती है। जैसे-सूर्य के प्रदक्षिण क्रम से गमन करे तो पुरवासियों का और चन्द्र के प्रदक्षिण क्रम से गमन करे तो बाहर रहने वालों का नाश करती है। जो उल्का सूर्यकिरण से निकल कर गमन करने वालों के आगे गिरती है, वह शुभ फल देने वाली होती है।
सफेद, लाल, पीली और काली उल्का क्रम से ब्राह्मण आदि वर्णों का नाश करने बाली होती है। जैसे-सफेद उल्का ब्राह्मणों का, लाल क्षत्रियों का, पीली वैश्यों का और काली शूद्रों का नाश करती है तथा जो शिर से ठहरती है वह ब्राह्मणों का, जो बगल से ठहरती है यह वैश्यों का एवं जो पूँछ से ठहरती है, वह शूद्रों का नाश करती है।
उत्तर आदि दिशाओं में पतित उल्का क्रम से ब्राह्मण आदि वर्णों को अशुभ फल देती है। जैसे- उत्तर दिशा में गिरे तो ब्राह्मणों को, पूर्व में गिरे तो क्षत्रियों को, दक्षिण में गिरे तो वैश्यों को और पश्चिम में गिरे तो शूद्रों को अशुभ फल देती है। यदि वह उल्का सोधी, चिकनी, अखण्ड और आकाश के नीचे भाग में जाने वाली हो तो ब्राह्मण आदि वर्णों की वृद्धि करती है।
श्याय (वानर के समान 'श्यावः स्यात् कपिश' इत्यमरः), रक्त, नील, रुधिर के समान, अग्नि के समान कालो, भस्म की तरह, रूक्ष, सन्ध्याकाल में उत्पन्न, दिन में उत्पन्न वक्र या खण्डित उल्का पुरवासियों को शत्रु के आगमन से भय कराती है।
यदि उल्का नक्षत्र या ग्रह का उपघात करे तो नक्षत्र व्यूह में उक्त उस नक्षत्र या ग्रह के भक्तियों का नाश करती है। यदि सूर्य या चन्द्र को उदय या अस्त समय में हनन करे तो क्रम से पुरवासियों और बाहर रहने वालों का नाश करती है। जैसे-सूर्य हत हो तो पुरवासियों का और चन्द्र हत हो तो बाहर रहने वालों का नाश करती है।
पूर्वफल्गुनी, पुनर्वसु, घनिष्ठा या मूल नक्षत्र की योगतारा यदि उल्का से हत हो तो युवती खियों को पीड़ा होती है।
पुष्य, स्वाती या श्रवण नक्षत्र को योगतारा यदि उल्का से हत हो तो ब्राह्मण और क्षत्रियों को पीड़ा होती है।
उल्का यदि देवता की मूर्ति पर गिरे तो राजा और राष्ट्र को भय, इन्द्र के ऊपर गिरे तो राजाओं को भप और घर पर गिरे तो गृहपति को पोदित करता है।
दिक्पति ग्रह यदि उल्का से हत हो तो उस दिशा में रहने वाले मनुष्यों को, खलिहान में गिरे तो किसानों को और छोटे मन्दिर के पास स्थित पूछ पर उल्का गिरे तो पूज्य व्यक्तियों को पीड़ित करता है।
पुराद्वार पर यदि उल्का गिरे तो पुर का, द्वार के किवाड़ पर गिरे तो पुरभासियों का, बढ़ा के पन्दिर पर गिरे तो बाह्मणों का और गोड (गापों के स्थान गोठ) पर गिरे तो गायों का पालन करने पातों का नाश करती है।
यदि उल्कापात के समय में ध्वेडा (वीरों का गर्जन 'क्ष्वेडा तु सिंहनादः स्यादित्यमरः), आस्फोटित (छाती पर एक भुजा रखकर दूसरे हाथ से ताडन का शब्द), बाद्य और गान का उद्घोषित शब्द हो तो राजा और राष्ट्र दोनों को भय के लिये होता है।
जिस उल्का को आसक्ति आकाश में अधिक देर तक रहे, जो दण्डाकार दिखाई दे, जो आकाश में डोरी से बंधी हुई की तरह स्थिर रहे, जो इन्द्रधनुष की तरह दिखाई दे यह सब राजभय के लिये होती है।
विपरीत (जहाँ से आयी हो यहाँ हो लौट जाने बाली उल्का सेठों का, तिरछी चलने वाली रानियों का, नीचे मुख वाली राजाओं का और ऊपर जाने वाली उल्का ब्राह्मणों का नाश करती है।
जो उल्का मोरपूँछ की तरह हो, यह लोगों का नाश करती है और जो सर्प की तरह चलती है, यह खियों को अशुभ फल देने वाली होती है।
मण्डलाकृति बाली उल्का नगर का और छत्राकृति वाली पुरोहित का नाश करती है तथा वंशगुल्माकारा (बाँस की बीड़ के समान वाली) उल्का राष्ट्रभय करती है।
सर्प या सूअर की तरह चिनगारियों की माला पहनी हुई (चिनगारियों से व्याप्त शरीर वाली), खण्ड-खण्ड और शब्दसहित उल्का पाप फल देने वाली होती है।
इन्द्रधनुष की तरह तथा आकाश में उत्पन्न होकर शीघ्र विलीन होने वाली उल्का भेषों का नाश करती है तथा वायु के प्रतिकूल टेढ़ी होकर चलने वाली और उत्पन्न होकर नीचे की तरफ नहीं चलने वाली शुभ नहीं होती है।
जिस ओर से आकर उल्का पुर या सेना के ऊपर गिरती है, उसी दिशा से राजा को भय होता है और जिस दिशा को प्रकाशित करती हुई गिरती है, उस दिशा में गमन करने वाला राजा शीघ्र ही शत्रुओं का नाश करता है।
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