अभिभवति यतः पुरं बलं वा भवति भयं तत एव पार्थिवस्य । निपतति च यया दिशा प्रदीप्ता जयति रिपूनचिरात्तया प्रयातः ॥
जिस ओर से आकर उल्का पुर या सेना के ऊपर गिरती है, उसी दिशा से राजा को भय होता है और जिस दिशा को प्रकाशित करती हुई गिरती है, उस दिशा में गमन करने वाला राजा शीघ्र ही शत्रुओं का नाश करता है।
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