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बृहत्संहिता • अध्याय 33 • श्लोक 25
श्रेष्ठिनः प्रतीपगा तिर्यगा नृपाङ्गनानाम् । हन्त्यधोमुखी नृपान् ब्राह्मणानथोर्ध्वगा ॥
विपरीत (जहाँ से आयी हो यहाँ हो लौट जाने बाली उल्का सेठों का, तिरछी चलने वाली रानियों का, नीचे मुख वाली राजाओं का और ऊपर जाने वाली उल्का ब्राह्मणों का नाश करती है।
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