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बृहत्संहिता • अध्याय 33 • श्लोक 17
नक्षत्रग्रहह्यातैस्तद्धक्तीनां क्षयाय निर्दिष्टा । उदये घ्नती रवीन्दू पौरेतरमृत्यवेऽस्ते वा ॥
यदि उल्का नक्षत्र या ग्रह का उपघात करे तो नक्षत्र व्यूह में उक्त उस नक्षत्र या ग्रह के भक्तियों का नाश करती है। यदि सूर्य या चन्द्र को उदय या अस्त समय में हनन करे तो क्रम से पुरवासियों और बाहर रहने वालों का नाश करती है। जैसे-सूर्य हत हो तो पुरवासियों का और चन्द्र हत हो तो बाहर रहने वालों का नाश करती है।
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