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बृहत्संहिता • अध्याय 33 • श्लोक 16
श्वावारुणनीई उसृग्दहनासितभस्मसन्निभा रूक्षा। सन्ध्यादिनजा वक्रा दलिता च परागमभयाय ॥
श्याय (वानर के समान 'श्यावः स्यात् कपिश' इत्यमरः), रक्त, नील, रुधिर के समान, अग्नि के समान कालो, भस्म की तरह, रूक्ष, सन्ध्याकाल में उत्पन्न, दिन में उत्पन्न वक्र या खण्डित उल्का पुरवासियों को शत्रु के आगमन से भय कराती है।
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