तारा हस्तं दीर्घा शुक्ला ताम्राब्जतन्तुरूपा वा। तिर्यगधश्चोर्ध्व वा याति वियत्युद्यमानेव ॥
तारा एक हाथ लम्बी, चेत, ताम्र या कमलसूत्र के समान (अति सूक्ष्म) आकाश में आकृष्ट होती हुई, तिरछी, नीचे और ऊपर की तरफ जाती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
बृहत्संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
बृहत्संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।