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बृहत्संहिता • अध्याय 33 • श्लोक 7
तारा हस्तं दीर्घा शुक्ला ताम्राब्जतन्तुरूपा वा। तिर्यगधश्चोर्ध्व वा याति वियत्युद्यमानेव ॥
तारा एक हाथ लम्बी, चेत, ताम्र या कमलसूत्र के समान (अति सूक्ष्म) आकाश में आकृष्ट होती हुई, तिरछी, नीचे और ऊपर की तरफ जाती है।
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