यस्याश्चिरं तिष्ठति खेऽनुषङ्गो दण्डाकृतिः सा नृपतेर्भयाय । या चोहाते तन्तुघृतेव खस्था या वा महेन्द्रध्वजतुल्यरूपा ॥
जिस उल्का को आसक्ति आकाश में अधिक देर तक रहे, जो दण्डाकार दिखाई दे, जो आकाश में डोरी से बंधी हुई की तरह स्थिर रहे, जो इन्द्रधनुष की तरह दिखाई दे यह सब राजभय के लिये होती है।
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