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बृहत्संहिता • अध्याय 33 • श्लोक 22
द्वारि पुरस्य पुरक्षयमथेन्द्रकोले जनक्षयोऽभिहितः । ब्रह्मायतने विप्रान् विनिहन्याद् गोभिनो गोष्ठे ॥
पुराद्वार पर यदि उल्का गिरे तो पुर का, द्वार के किवाड़ पर गिरे तो पुरभासियों का, बढ़ा के पन्दिर पर गिरे तो बाह्मणों का और गोड (गापों के स्थान गोठ) पर गिरे तो गायों का पालन करने पातों का नाश करती है।
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