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बृहत्संहिता • अध्याय 33 • श्लोक 13
पौरेतरघ्नमुल्कापसव्यकरणं दिवाकरहिमांश्वोः । उल्का शुभदा पुरतो दिवाकरविनिः सृता यातुः ॥
यदि उल्का सूर्य और चन्द्रमा के प्रदक्षिण क्रम से गमन करे तो क्रम से पुर में रहने बाले और बाहर रहने वाले का नाश करती है। जैसे-सूर्य के प्रदक्षिण क्रम से गमन करे तो पुरवासियों का और चन्द्र के प्रदक्षिण क्रम से गमन करे तो बाहर रहने वालों का नाश करती है। जो उल्का सूर्यकिरण से निकल कर गमन करने वालों के आगे गिरती है, वह शुभ फल देने वाली होती है।
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