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बृहत्संहिता • अध्याय 33 • श्लोक 26
बर्हिपुच्छरूपिणी लोकसंक्षयावहा। सर्पवत् प्रसर्पती योषितामनिष्टदा ॥
जो उल्का मोरपूँछ की तरह हो, यह लोगों का नाश करती है और जो सर्प की तरह चलती है, यह खियों को अशुभ फल देने वाली होती है।
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