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अध्याय 32 — अथ भूकम्पलक्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
29 श्लोक • केवल अनुवाद
किसी-किसी (काश्यप आदि) का मत है कि जल में रहने वाले बड़े प्राणियों के धक्के से भूकम्प होता है तथा अन्य (गर्ग आदि) आचार्यों का मत है कि पृथ्वी के भार से धके हुये दिग्गजों के विश्राम से भूकम्प होता है।
किसी ( वसिष्ठ आदि) का मत है कि वायु एक-दूसरे से टकराकर पृथ्वी पर गिरते हुये शब्द के साथ भूकम्प करता है। दूसरे (वृद्धगर्ग आदि) का मत है कि प्रजाओं के अदृष्ट (धर्माधर्म) के द्वारा भूकम्प होता है।
पूर्वकाल में आकाश से गिरते हुए और पृथ्वी से उड़ते हुए पंख वाले पर्वतों के द्वारा कम्पित पृथ्वी देवताओं की सभा में तन्हा के साथ ब्रह्माजी से बोली
आपने मेरा नाम अचला रखा है; पर चलायमान, भ्रमण करते हुए पर्वतों के द्वारा वह (नाम) वैसा नहीं रहा अर्थात् मैं चलायमान हूँ
उस (पृथ्वी) का गढ़द वापी बाला, कुछ-कुछ फड़कते हुए अधर बाला, नम्र और अनुयुत नेत्र चाला मुख देख कर ब्रह्माजी ने कहा- हे इन्द्र। पृथ्वी को आपत्ति का हरण करो और पर्वतों के पंख का नारा करने के लिये बज का प्रहार करो।
मन्युं हरेन्द्र धात्र्याः क्षिप कुलिशं शैलपक्षभङ्गाय। शक्रः कृतमित्युक्त्वा मा भैरिति वसुमतीमाह
जैसे कि दिन के पूर्व में बायु, उत्तरार्द्ध में अग्नि, रात्रि के पूर्वार्द्ध में इन्द्र और उत्तरार्द्ध में वरुण तुझे कम्पित करेंगे।
उत्तरफल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, पुनर्वसु, मृगशिरा, अश्विनी - ये सात नक्षत्र वायव्य मण्डल के हैं। यदि इनमें से किसी भी नक्षत्र में भूकम्प हो तो इसके सात दिन पूर्व आगे कथित लक्षण होते हैं।
धूम से व्याप्त दिशा वाला आकाश होता है, पृथ्वी से धूलि उड़ाती हुई और वृक्षों को तोड़ती हुई हवा चलती है एवं सूर्य के किरण मन्द हो जाते हैं।
वायव्य भूकम्प होने से धान्य, जल और वनौषधियों का नाश होता है तथा व्यापारियों को शोथ, दमा, उन्माद, ज्वर और खाँसी से उत्पन्न पीड़ा होती है।
यह वेश्या, शत्रजीवी, वैद्य, कवि, गान विद्या जानने वाले, व्यापारी, शिल्पी तथा सौराष्ट्र, कुरु, मगध, दशार्ण और मत्स्यदेशवासी मनुष्यों को पीड़ित करता है।
पुष्य, कृत्तिका, विशाखा, भरणी, मघा, पूर्वभाद्रपदा, पूर्वफाल्गुनी- ये सात नक्षत्र आग्नेय मण्डल के हैं। यदि इनमें से किसी भी नक्षत्र में भूकम्प हो तो इसके सात दिन पूर्व आगे कथित लक्षण होते हैं।
सात दिन के मध्य में दिग्दाह के साथ तारा तथा उल्का के गिरने से व्याप्त; अतः प्रज्वलित की तरह आकाश होता है तथा वायु की सहायता से अग्नि विचरण करती है।
आग्नेय भूकम्प में मेघ और जलाशयों (वापी, कूप और तालाब ) का नाश, राजाओं में परस्पर द्वेष, दाह, विचचिंका, ज्वर, विसर्पिका और पाण्डु रोग होता है।
लाशयों (वापी, कूप और तालाब ) का नाश, राजाओं में परस्पर द्वेष, दाह, विचचिंका, ज्वर, विसर्पिका और पाण्डु रोग होता है। यह तेजस्वी, क्रोधी मनुष्य, अश्मक, अङ्ग, बाह्रीक, तङ्गण, कलिङ्ग, वङ्ग, द्रविण
अभिजित्, श्रवण, घनिष्ठा, रोहिणी, ज्येष्ठा, उत्तराषाढा, अनुराधा-ये सात नक्षत्र इन्द्रमण्डल के हैं। यदि इनमें से किसी भी नक्षत्र में भूकम्प हो तो उसके सात दिन पूर्व आगे कथित लक्षण होते हैं।
जैसे कि पर्वत के समान शरीर वाले, गम्भीर शब्द करने वाले, बिजली वाले, महिषशृङ्ग, प्रमरकुल और सपों के समान कान्ति वाले मेघ वर्षा करते हैं।
ऐन्द्र कम्प में प्रधान कुल में उत्पन्न मनुष्य, यशस्वी, राजा और सङ्घियों में प्रधान का नाश करता है तथा अतिसार, कण्ठरोग, मुखरोग और कफ के रोग होते हैं।
काशी, युगन्धर, पौरव, किरात, कौर, अभिसार, हल, मद्र, अर्बुद, सुराष्ट्र और मालवदेशवासी मनुष्यों को पीड़ित करता है एवं प्रयोजन के अनुसार वृष्टि करता है।
रेवती, पूर्वाषाढ़ा, आर्दा, आश्लेषा, मूल, उत्तरभाद्रपदा, शतभिषा- ये सात नक्षत्र वरुणमण्डल के हैं।
यदि इनमें से किसी भी नक्षत्र में भूकम्प हो तो इसके सात दिन पूर्व आगे कथित लक्षण होते हैं। जैसे कि यारुण कम्प में समुद्र और नदी के तट पर रहने बालों का नाश,
अतिवृष्टि, परस्पर द्वेषरहित मनुष्य तथा गोनर्द, चेदी, कुकुर, किरात और वैदेह देश में रहने वाले मनुष्यों का नाश करता है।
भूकम्प का फल छः महीने में और निर्घात का फल दो महीने में घटित होता है। गर्ग आदि मुनियों का मत है कि अन्य (निर्यात, उल्कापात आदि) उत्पातों का फल मण्डल के साथ ही होता है।
इन्द्र के मण्डल में उत्पन्न कम्प वायव्य कम्प का, वायव्य मण्डल में उत्पन्न कम्प इन्द्रकम्प का, वारुण मण्डल में उत्पन्न कम्प अग्निकम्प का, अग्निमण्डल में उत्पन्न कम्प वारुण कम्प का, वेलाजात कम्प नक्षत्र कम्प का और नक्षत्रजात कम्प वेलाजात कम्प का नाश करता है। यदि वायव्य मण्डलान्तर्गत वायव्य वेला में कम्प हो तो अपने फल को पुष्ट करता है। इसी प्रकार मण्डल का अन्य भी फल जानना चाहिये; अन्यथा नहीं।
यदि आग्नेय मण्डल और वायव्य वेला में या वायव्य मण्डल और आग्नेय बेला में भूकम्प हो तो विख्यात राजाओं को मरण या मरणतुल्य कष्ट होता है तथा मनुष्यगण दुर्भिक्ष, मृत्यु और अवृष्टि से पीड़ित होते हैं।
यदि बारुण मण्डल और ऐन्द्र वेला में या ऐन्द्र वेला और वारुण मण्डल में भूकम्प हो तो लोगों में सुभिक्ष, कुशल, वृष्टि और चित्त में शान्ति होती है तथा गौ अधिक दूध देती है और राजा लोग परस्पर द्वेषरहित होते हैं।
अङ्गस्फुरण आदि उपद्रवों में जिसका फलकाल नहीं कहा गया है, वह यदि वायव्य मण्डल में हो तो दो मास में, आग्नेय मण्डल में हो तो तीन पक्ष ( डेढ़ मास ) में, इन्द्र मण्डल में हो तो सात दिन में और वारुण मण्डल में हो तो उसी दिन फल देता है।
यदि वायुमण्डल में भूकम्प हो तो दो सौ योजन तक, अग्निमण्डल में हो तो दश योजन तक, वारुण मण्डल में हो तो एक सौ अस्सी योजन तक और ऐन्द्र मण्डल में भूकम्प हो तो साठ से अधिक योजन तक पृथ्वी को कम्पित करता है।
यदि भूकम्प होने के बाद तीसरे, चौथे, सातवें, पन्द्रहवें या पैंतालीसवें दिन में फिर भूकम्प हो तो प्रधान राजा का नाश करता है।
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