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बृहत्संहिता • अध्याय 32 • श्लोक 9
धूमाकुलीकृताशे नभसि नर्भस्वान् रजः क्षिपन् भौमम् । विरुजन् द्रुमांश्च विचरति रविरपटुकरावभासी च ॥
धूम से व्याप्त दिशा वाला आकाश होता है, पृथ्वी से धूलि उड़ाती हुई और वृक्षों को तोड़ती हुई हवा चलती है एवं सूर्य के किरण मन्द हो जाते हैं।
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