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बृहत्संहिता • अध्याय 32 • श्लोक 5
तस्याः सगद्दगिरं किञ्चित् स्फुरिताघरं विनतमीयत् । सानुविलोचनमाननमालोक्य पितामहः प्राह ।।
उस (पृथ्वी) का गढ़द वापी बाला, कुछ-कुछ फड़कते हुए अधर बाला, नम्र और अनुयुत नेत्र चाला मुख देख कर ब्रह्माजी ने कहा- हे इन्द्र। पृथ्वी को आपत्ति का हरण करो और पर्वतों के पंख का नारा करने के लिये बज का प्रहार करो।
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