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बृहत्संहिता • अध्याय 32 • श्लोक 13
तारोल्कापातावृतमादीप्तमिवाम्बरं सदिग्दाहम् । विचरति मरुत्सहायः सप्तार्चिः सप्तदिवसान्तः ॥
सात दिन के मध्य में दिग्दाह के साथ तारा तथा उल्का के गिरने से व्याप्त; अतः प्रज्वलित की तरह आकाश होता है तथा वायु की सहायता से अग्नि विचरण करती है।
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