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बृहत्संहिता • अध्याय 32 • श्लोक 27
पक्षैश्चतुर्भिरनिलस्त्रिभिरग्निर्देवराट् च सप्ताहात् । सद्यः फलति च वरुणो येषु न कालोऽद्भुतेषूक्तः ॥
अङ्गस्फुरण आदि उपद्रवों में जिसका फलकाल नहीं कहा गया है, वह यदि वायव्य मण्डल में हो तो दो मास में, आग्नेय मण्डल में हो तो तीन पक्ष ( डेढ़ मास ) में, इन्द्र मण्डल में हो तो सात दिन में और वारुण मण्डल में हो तो उसी दिन फल देता है।
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