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बृहत्संहिता • अध्याय 32 • श्लोक 2
अनिलोऽनिलेन निहतः क्षितौ पतन् सस्वनं करोत्यन्ये । केचित्त्वदृष्टकारितमिदमन्ये प्राहुराचार्याः ॥
किसी ( वसिष्ठ आदि) का मत है कि वायु एक-दूसरे से टकराकर पृथ्वी पर गिरते हुये शब्द के साथ भूकम्प करता है। दूसरे (वृद्धगर्ग आदि) का मत है कि प्रजाओं के अदृष्ट (धर्माधर्म) के द्वारा भूकम्प होता है।
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