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बृहत्संहिता • अध्याय 32 • श्लोक 24
हन्त्यैन्द्रो वायव्यं वायुश्चाप्यैन्द्रमेवमन्योऽन्यम् । वारुणहौतभुजावपि वेलानक्षत्रजाः कम्पाः ॥
इन्द्र के मण्डल में उत्पन्न कम्प वायव्य कम्प का, वायव्य मण्डल में उत्पन्न कम्प इन्द्रकम्प का, वारुण मण्डल में उत्पन्न कम्प अग्निकम्प का, अग्निमण्डल में उत्पन्न कम्प वारुण कम्प का, वेलाजात कम्प नक्षत्र कम्प का और नक्षत्रजात कम्प वेलाजात कम्प का नाश करता है। यदि वायव्य मण्डलान्तर्गत वायव्य वेला में कम्प हो तो अपने फल को पुष्ट करता है। इसी प्रकार मण्डल का अन्य भी फल जानना चाहिये; अन्यथा नहीं।
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