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अध्याय 13 — ज्यौतिषोपनिषदध्याय:
सूर्य सिद्धांत
25 श्लोक • केवल अनुवाद
(अथ शब्द यहाँ मंगल वाची है। अनन्तर से यहाँ अभिप्राय नहीं हैं) स्नानादि से पवित्र होकर अलड्डार धारण कर (अर्थात् वस्त्रालड्जार से युक्त होकर) एकान्त में भक्तिपूर्वक भगवान् भास्कर, ग्रहों , नक्षत्रों, तथा गुह्मकों (यक्षों)
की पूजा कर परम्परा से प्राप्त उपदेशों द्वारा तथा गुरु के मुखारविन्द से प्राप्त यथार्थ ज्ञान से शिष्यों को अवगत कराने हेतु, सब कुछ प्रत्यक्ष प्रदर्शित करने वाले तथा आश्चर्य उत्पन्न करने वाले पृथ्वी और खगोल (यन्त्र) की रचना आचार्य को करनी चाहिये।
अभीष्ट परिमाण वाला काष्ठ का एक पृथ्वी का गोल बनाकर उसके मध्य में एक ऐसा दण्ड (कील) स्थापित करें जो मध्यगंत होता हुआ दोनों मेरु स्थानों (उत्तर और दक्षिण) में बराबर निकला रहे। दोनों मेरुओं से दो आधार वृत्त की रचना करें।
दोनों मेरुओं में जाने वाली याम्योत्तर रेखा तथा याम्योत्तर वृत्त के मध्यगत ९० अंश पर स्थित उन्मण्डल वृत्त की रचना करनी चाहिये। दोनों आधार वृत्तों के मध्यगत, विषुवद् वृत्त की रचना करें। तीनों वृत्तों पर एक एक अंश के ३६० चिन्ह अंकित करें।
पूर्वोक्त नाडी वृत्त के दक्षिणोत्तर भाग में स्व स्व अहोरात्र वृत्तों के अर्धव्यास से विषुवद् वृत्त के प्रमाणानुसार अर्थात् अनुपात द्वारा स्व स्व क्रान्ति विक्षेपांशो (अर्थात् क्रान्त्यंशो) से चिहिनत विन्दुओं से
अर्थात् स्व स्व चुज्या व्यासार्ध से (नाडी वृत्त के समानान्तर) मेषादि राशियों के तीन अहोरात्र वृत्त होते हैं। उन्हीं के विपरीत क्रम से कर्कादि तीन राशियों की कक्षायें होती हैं।
उसी प्रकार तुलादि तीन राशियों की (दक्षिण भाग में) कक्षायें (अहोरात्र वृत्त) होती हैं तथा वही विपरीत क्रम से मकरादि तीन राशियों की भी कक्षायें होती हैं। (इस प्रकार नाडी वृत्त से उत्तर मेषादि ६ राशियों के तथा दक्षिण भाग में तुलादि ६ राशियों के अहोरात्र वृत्त होते हैं)।
कक्षा आधार अथांत् विषुवत् वृत्त से दक्षिण और उत्तरभाग में स्थित नक्षत्रों, अभिजितू, सप्तर्षिमण्डल, अगस्त्य, ब्रह्महदय, लुब्धक आदि के भी अहोगात्र वृत्तों की रचना करनी चाहिये।
सभी अहोरगात्र वृत्तों के मध्य में विषुवद्वृत्तीय कक्षा होती हैं।
उस विषुव वृत्त और उसके आधार वृत्त (उन्मण्डलवृत्त) के युति स्थान से ऊपर (९० या ३ राशि के अन्तर पर) दोनों अयन बिन्दु होते हैं। (अर्थात् सम्पात बिन्दु से ९० अंश पर स्थित याम्योत्तर वृत्त में कर्कादि बिन्दु उत्तर में तथा मकरादि बिन्दु दक्षिण में क्रमश: दक्षिणायन और उत्तरायण के आरम्भ बिन्दु होते हैं) तथा नाडीवृत्त और उन्मण्डलवृत्त का सम्पात बिन्दु विषुव स्थान होता हैं।
प्राची में सायन मेषादि बिन्दु पश्चिम में सायन तुलादि बिन्दु होते हैं । इन विषुव बिन्दुओं (मेषादि, तुलादि) से (३०) तीस-तीस अंशो पर (द्वादश) राशियों का सन्निवेशकर के तिर्यक् ज्या रेखाओं द्वारा मेषादि राशियों के क्षेत्रों की कल्पना करनी चाहिये। (यथा---मेषादि राशियों की ज्या कर्ण, क्रान्तिज्या भुज तथा दोनों के वर्गान््तर का मूल रूप द्युज्या वृत्त में कोटि)। एक अयन बिन्दु से दूसरे अयन बिन्दु तक तिर्यक् नाडीवृत्त के प्रमाणानुसार एक अन्य वृत्त की रचना करने पर इसकी क्रान्तिवृत्त संज्ञा होती है। इसी वृत्त में सूर्य (समस्त ब्रह्माण्ड को) प्रकाशित करते हुये भ्रमण करते हैं।
चन्द्रादि ग्रहों की कक्षायें क्रान्तिवत्त से सम्बन्धित (आश्रित) अपने अपने सम्पात् बिन्दुओं से अपनी-अपनी क्रान्ति तुल्य अन्तरित होते हुये विक्षेप के अग्रभाग में दिखलाई पड़ती हैं। (ग्रहों की इन कक्षाओं को विमण्डल वृत्त कहते हैं प्रत्येक ग्रह अपने अपने विमण्डल में भ्रमण करते हैं)।
उदय क्षितिज से लगा हुआ (क्रान्तिवृत्त का भाग) उदय लग्न या लग्न संज़्क तथा पश्चिम में अस्तड्रत होता हुआ (अस्त क्षितिज से संलग्न क्रान्तिवृत्त का भाग) अस्त लग्न तथा लंका के क्षितिज पर उदय होता हुआ क्रान्तिवृत्त का खमध्य स्थित भाग मध्य लग्न संज्ञक होता है।
मध्य स्थान (अहोरात्र वृत्त और याम्योत्तर वृत्त के सम्पात बिन्दु) से क्षितिज वृत्त पर्यन्त ज्या रेखा अन्त्या संज्ञक होती है। (अर्थात् याम्योत्तर वृत्त और क्षितिज वृत्त के मध्यवर्ती अहोरात्रवृत्त के चाप की ज्या अन्त्या होती है)। विषुवत क्षितिज अर्थात् उन्मण्डल वृत्त और अपने क्षितिज वृत्त के अन्तर की ज्या चरज्या होती है। क्षितिज और उन्मण्डल वृत्त के मध्य अहोरात्र वृत्त खण्ड की ज्या, कुज्या होती है इसे त्रिज्यावृत्त में परिणत करने पर चरज्या होती है।
अपने स्थान को उपर करके वहाँ से मध्य में अपना क्षितिज मण्डल होता है। अर्थात् स्व स्थान के ख मध्य बिन्दु से ९०” पर किया गया वृत्त स्व स्थानीय क्षितिजवृत्त होता है। (नवत्यंश वृत्त गोल के मध्य से होता हुआ जाता है। इसीलिए मध्यगत कहा गया है)।
लोकालोक अर्थात् दृश्य और अदृश्य गोल के नियामक क्षितिज वृत्त से वेष्टित पूर्वोक्त विधि से निर्मित गोल को वस्त्र से ढक दें। वस्त्राच्छन्नन गोल पर जल धारा का ऐसा प्रवाह करें जिससे कि गोल भ्रमण करता हुआ नाक्षत्र काल को सूचित करे। (अर्थात् गोल भ्रमण से नाक्षत्र मान की किसी इकाई का साधन हो सके)
(अथवा) गोल में पारा का संयोग इस प्रकार करें जिससे गोल भ्रमण करता हुआ नाक्षत्र काल सूचित करे। इस विधि को गुप्त रखना चाहिये अन्यथा इसे प्रकाशित करने पर यह सिद्धान्त सर्वगम्य (सहज होने से विकृत) हो जायेगा।
इसलिए गुरु द्वारा उपदिष्ट विधि से उत्तम गोलयन्त्र की रचना करनी चाहिये। युग युगान्तर में यह रचना विधि लुप्त हो जाती है। भगवान् सूर्य के प्रसाद से उनकी इच्छानुसार किसी को पुनः: यह विद्या प्राप्त हो जाती है। अर्थात् पुनः युगान्तर में यह गोल विद्या सूर्य की कृपा से प्रकट हो जाती है।
कालज्ञान हेतु इस प्रकार के यन्त्रों का निर्माण करना चाहिये। यन्त्र को चमत्कारिक ढड़ से चलायमान (भ्रमणशील) करने के लिए उसमें पारे का प्रयोग एकान्त स्थान में करना चाहिये।
शकु, यष्टि, धनु, चक्र, आदि अनेक प्रकार के छाया यंत्रों द्वारा तन्द्रा रहित अर्थात् अत्यन्त सावधानी से दैवज्ञ को गुरु द्वारा बताये गये मार्ग से कालज्ञान करना चाहिये।
कपाल आदि जल यंत्रों से यूर, नर, तथा वानर यंत्रों से, जिनमें सूत्र के साथ बालू (रेत) भरे होते हैं, उनसे विधिवत् कालज्ञान करना चाहिये।
यंत्र को गतिशील करने के लिए उसमें पारा, आरा (सूत्र विशेष), जल, सूत्र, ताम्र, तैल एवं जल का प्रयोग करना चाहिये। पारा और पांसु (रेत) को यन्त्र में स्थापित करना चाहिये किन्तु ये प्रयोग भी दुर्लभ (कठिन) हैं।
ताम्रपात्र के नीचे (पेटे में) छिद्र कर स्वच्छ जल वाले कुण्ड में डाल दें। यदि एक अहोरात्र में (६० घटी में) वह ६० बार जल में डूब जाय तो वही शुद्ध कपालयन्त्र होता है।
केवल दिन में जब आकाश स्वच्छ हो तथा निर्मल रवि हो उस समय शंकु यंत्र से सम्यक् छाया साधन करने से उत्तम काल का ज्ञान होता है अर्थात् शुद्ध कालज्ञान होता है।
ग्रह नक्षत्रों के चरित (अर्थात् उनकी स्थिति गत्यादि) को तथा गोल को यथार्थ रूप में जानकर मनुष्य ग्रहलोक को प्राप्त करता है तथा जन्मान्तर में भी आत्मज्ञानी होता है।
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