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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 13 • श्लोक 11
क्षेत्राण्येवमजादीनां तिर्यग्ज्याभि: प्रकल्पयेत्‌ । अयनादयनं चैव कक्षा तिर्यक्‌ तथाउपरा ॥ क्रान्तिसंज्ञा तया सूर्य: सदा पर्यति भासयन्‌ ।
प्राची में सायन मेषादि बिन्दु पश्चिम में सायन तुलादि बिन्दु होते हैं । इन विषुव बिन्दुओं (मेषादि, तुलादि) से (३०) तीस-तीस अंशो पर (द्वादश) राशियों का सन्निवेशकर के तिर्यक्‌ ज्या रेखाओं द्वारा मेषादि राशियों के क्षेत्रों की कल्पना करनी चाहिये। (यथा---मेषादि राशियों की ज्या कर्ण, क्रान्तिज्या भुज तथा दोनों के वर्गान्‍्तर का मूल रूप द्युज्या वृत्त में कोटि)। एक अयन बिन्दु से दूसरे अयन बिन्दु तक तिर्यक्‌ नाडीवृत्त के प्रमाणानुसार एक अन्य वृत्त की रचना करने पर इसकी क्रान्तिवृत्त संज्ञा होती है। इसी वृत्त में सूर्य (समस्त ब्रह्माण्ड को) प्रकाशित करते हुये भ्रमण करते हैं।
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