शकु, यष्टि, धनु, चक्र, आदि अनेक प्रकार के छाया यंत्रों द्वारा तन्द्रा रहित अर्थात् अत्यन्त सावधानी से दैवज्ञ को गुरु द्वारा बताये गये मार्ग से कालज्ञान करना चाहिये।
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