कालज्ञान हेतु इस प्रकार के यन्त्रों का निर्माण करना चाहिये। यन्त्र को चमत्कारिक ढड़ से चलायमान (भ्रमणशील) करने के लिए उसमें पारे का प्रयोग एकान्त स्थान में करना चाहिये।
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