अभीष्ट परिमाण वाला काष्ठ का एक पृथ्वी का गोल बनाकर उसके मध्य में एक ऐसा दण्ड (कील) स्थापित करें जो मध्यगंत होता हुआ दोनों मेरु स्थानों (उत्तर और दक्षिण) में बराबर निकला रहे। दोनों मेरुओं से दो आधार वृत्त की रचना करें।
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