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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 13 • श्लोक 1
गोलरचनाप्रकार: अथ गुप्ते शुच्ौ देशे स्नात: शुचिरलड-कृत:। सम्पूज्य भास्कर भक्त्या ग्रहान्‌ भान्यथ गुह्मयकान्‌ ॥
(अथ शब्द यहाँ मंगल वाची है। अनन्तर से यहाँ अभिप्राय नहीं हैं) स्नानादि से पवित्र होकर अलड्डार धारण कर (अर्थात्‌ वस्त्रालड्जार से युक्त होकर) एकान्त में भक्तिपूर्वक भगवान्‌ भास्कर, ग्रहों , नक्षत्रों, तथा गुह्मकों (यक्षों)
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