अपने स्थान को उपर करके वहाँ से मध्य में अपना क्षितिज मण्डल होता है। अर्थात् स्व स्थान के ख मध्य बिन्दु से ९०” पर किया गया वृत्त स्व स्थानीय क्षितिजवृत्त होता है। (नवत्यंश वृत्त गोल के मध्य से होता हुआ जाता है। इसीलिए मध्यगत कहा गया है)।
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