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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 13 • श्लोक 10
क्रान्तिवृत्तम्‌ तदाधारयुतेरूथध्वमयने विषुवद्द्वधयम्‌ । विषुवत्स्थानतो भागै: स्फुटेर्भगणसजञ्चरात्‌ ।।
उस विषुव वृत्त और उसके आधार वृत्त (उन्मण्डलवृत्त) के युति स्थान से ऊपर (९० या ३ राशि के अन्तर पर) दोनों अयन बिन्दु होते हैं। (अर्थात्‌ सम्पात बिन्दु से ९० अंश पर स्थित याम्योत्तर वृत्त में कर्कादि बिन्दु उत्तर में तथा मकरादि बिन्दु दक्षिण में क्रमश: दक्षिणायन और उत्तरायण के आरम्भ बिन्दु होते हैं) तथा नाडीवृत्त और उन्मण्डलवृत्त का सम्पात बिन्दु विषुव स्थान होता हैं।
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