इसलिए गुरु द्वारा उपदिष्ट विधि से उत्तम गोलयन्त्र की रचना करनी चाहिये। युग युगान्तर में यह रचना विधि लुप्त हो जाती है। भगवान् सूर्य के प्रसाद से उनकी इच्छानुसार किसी को पुनः: यह विद्या प्राप्त हो जाती है। अर्थात् पुनः युगान्तर में यह गोल विद्या सूर्य की कृपा से प्रकट हो जाती है।
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