अध्याय 9 — नवम अध्याय
शिवभारतम्
40 श्लोक • केवल अनुवाद
उस नगर की सीमा एवं नगर द्वार मजबूत थे। सफेदी से सफेद किए हुए महल के शिखर पर स्थित पताका गगन भेदी थी और वह महल सभी प्रकार के शिल्पकलाओं से परिपूर्ण रमणीय हवेलियों से व्याप्त था, पक्षी गृह में बैठे हुए असंख्य कबूतर वहां घूमते थे, खिड़की से उड़ने वाले मोरों की केका आवाज से वह महल मनोहर था, विस्तीर्ण दुकानों में बेचने के लिए वस्तुएं रखी गई थी, वहां प्रत्येक घर में कुएं और उस शहर में सुंदर एवं विस्तीर्ण बावड़ियां थी, उसी प्रकार वहां अनेक चौक थे और उनमें स्थित फव्वारों से पानी उड़ता था, गृह उद्यान के विकसित पेड़ों की छाया से भूमि आच्छादित थी, महल की दीवार पर चित्रित उत्कृष्ट चित्रों से लोगों की आंखें लुब्ध हो जाया करती थी, अनेक प्रकार के रंगों से युक्त पत्थरों से बांधी हुई सुंदर अश्वशाला थी, बड़े-बड़े नगर द्वारों के शिखर पाषाणों से सुशोभित थे, महल के मस्तक पर रखे हुए तोपों से वह अत्यंत दुर्गम हो गया था, युद्ध में निपुण सेना के समूह ने उसकी रक्षा की थी, चारों ओर गहरे पानी की खाइयों से वह सुशोभित दिख रहा था, अपार समुद्र के समान विस्तीर्ण तालाब से वह शोभित हो रहा था, वहां वायु के वेग से हिलने डुलने वाली लताओं युक्त सुंदर बगीचे थे, मेरुपर्वत के समान मंदिरों से वह शहर मंडित था, इस प्रकार उस नगर में निवास करने वाला इंद्र जैसा वह नृपश्रेष्ठ अपने परिजनों के साथ आनंद को प्राप्त कर रहा था।