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अध्याय 9 — नवम अध्याय

शिवभारतम्
40 श्लोक • केवल अनुवाद
कवींद्र बोलें - उसके बाद देवगिरी प्राप्त हो जाने से दिल्ली के बादशाह को आनंद हुआ तथा उन्मुक्त महमूद को अपनी सेना के पराजित होने से दुःख हुआ।
इसी बीच शहाजीराजे ने निजामशाह के शिवनेरी आदि अनेक प्रमुख किले शीघ्र ही अपने अधीन कर लिए।
उसी प्रकार अत्यंत पवित्र गोदावरी और प्रभावशाली प्रवरा, क्षीर सागर के जैसे जल वाली नीरा, भयंकर भीमा नदी इन नदियों के तटवर्ती
सभी जनपदों पर क्रमशः आक्रमण करके उसने शीघ्र ही सह्याद्रि को भी अपने अधीन कर लिया।
जब शहाजीराजे को दिल्ली के बादशाह के विरुद्ध हुआ देखा तब घाटगे, कांटे, ठोमरे, चव्हाण, मोहिते, महाडीक, खराटे, पांढरे, वाघ, घोरपड़े आदि महाराष्ट्रीयन राजा उसको आकर मिलें और तब शहाजीराजे ने उन सबको सेनापति बना दिया।
फिर शहाजीराजे को जीतने के इच्छुक शहांजहा ने आदिलशाह के साथ तुरंत सन्धि कर ली। उसके बाद राजेंद्र शहाजी को जीतने की इच्छुक उन दोनों ने भीमा नाम की महानदी से परस्पर राज्यों के मध्य की सीमा निश्चित की।
पंडित बोले - साहसी एवं शेर के समान पराक्रमी शहाजीराजे ने आदिलशाह और शहाजहा की सेना के साथ कितने वर्षों तक युद्ध किया? फिर उन दोनों में सन्धि किस प्रकार हुई? हे कवींद्र! ये आपसे सुनने की हमारी इच्छा है।
कवींद्र बोले - सूर्य की तरह पराक्रमी शहाजीराजे ने शहाजहा और आदिलशाह की सेना के साथ तीन वर्षों तक युद्ध किया।
उसके बाद उसको स्वप्न में स्वप्नपति शंकर के दर्शन हो गए और उसने उनको नमन किया, तब अपने दांतों की कांति से उसकी आंखों को प्रदीप्त करते हुए बोलें।
शंकर बोले - यह महातेजस्वी दिल्लीपति पृथ्वी पर अजेय है, इसलिए हे बुद्धिमान राजा! तुम इस युद्ध कार्य से ठहर जाओ। इस दुराचारी ने पहले की हुई तीव्र तपस्या के समाप्त होने तक इसका नाश नहीं होगा। तात! ये सभी यवन वंशी हैं और वे देव एवं ब्राह्मणों से पग-पग पर द्वेष करते हैं। इन यवनों का विनाश करने के लिए जो पृथ्वी पर अवतरित हुआ है वह भगवान विष्णु, शिव नामधारी तेरा बेटा है। वह तेरे इष्टकार्य को शीघ्र ही पूर्ण करेगा इसलिए हे महाबलशाली! तुम कुछ समय प्रतीक्षा करो।
इस प्रकार उस प्रेममय शंकर देव के कहने पर राजा प्रसन्नचित्त होकर सबेरे जागृत हुआ।
तब शहाजीराजे ने अपने राज्य को छोड़कर, निजामशाह राज्य के कुछ राज्य दिल्ली के बादशाह को एवं कुछ राज्य आदिलशाह को दे दिए।
जिद्दी स्वभाव के होते हुए भी शहाजीराजे ने अपने ज़िद्दीपन को छोड़कर शंकर की आज्ञानुसार दिल्ली के बादशाह एवं आदिलशाह के साथ सन्धि कर ली।
निजाम शाह का राज्य मिल जाने के कारण प्रसन्नचित्त, दूसरों के राज्य पर आक्रमण करने वाले मुगलों के वापस लौट जाने पर, बुद्धिमान आदिलशाह को, हम दुर्बल हैं ऐसा प्रतीत होने लग गया और उसने अपने मन में विचार किया कि जिस सामर्थ्यवान मुगलों ने निजाम शाह को युद्ध रूपी समुद्र में डूबा दिया है, प्रायः वे मुझे भी डूबा देंगें। इसलिए इस महाबाहु शाहजी को अपनी सहायता के लिए साथ लेकर मैं अपने इच्छित कार्यों को सिद्ध कर लूंगा।
पहले मेरे पिता इब्राहिम शाह इसकी सहायता से ही शत्रुओं का विध्वंस करके मन से निश्चिंत होकर रहते थे। फिर उनकी मृत्यु के बाद मेरी मूर्खता के कारण मैंने उसका अपमान किया जिसके कारण वह अभिमानी शाहजी मुझे छोड़कर चला गया। इब्राहिम शाह ने इस स्वाभिमानी एवं पराक्रमी शाहजी पर मेरे से अधिक प्रेम करके उसका पालन पोषण किया था।
इस प्रकार मन में विचार करके उस तेजस्वी महमूदशाह ने तुरंत ही शाहजी के पास अपने अमात्य को भेज दिया।
उस नीति निपुण अमात्य ने शाहजी से विनम्रता पूर्वक निवेदन किया और उस पराक्रमी शाहजी ने भी आदिलशाह को सहायता करने का वचन दे दिया।
सहायता करने वाले शहाजी राजा का आधार मिल जाने के कारण से महमूदशाह को पग-पग पर बड़ा आनंद होने लगा।
बाद में उस प्रतापी महमूदशाह ने संपूर्ण सेना के प्रिय एवं रणधुरंधर फरादखान के पुत्र सेनापति रणदुल्लाखान को, पराक्रमी शाहजी राजा के साथ कर्नाटक राज्य को जीतने के लिए भेज दिया।
तब फरादखान, याकूतखान, अंकुशखान हुसैन, अंबरखान, मसाऊदखान, वैसे ही पवार, घाटगे, इंगले, गाढ़े, घोरपड़े आदि बड़े-बड़े योद्धाओं के साथ रणदुल्लाखान युद्ध के लिए निकल गया।
उस सेनापति के साथ महामना एवं बलशाली भोसले राजा भी कर्नाटक चला गया।
बिंदुपुर के राजा महा तेजस्वी वीरभद्र, वृषपत्तन का राजा प्रसिद्ध केंग नाइक, कावेरी पत्तन का राजा महाबाहु जगदेव, श्रीरंगपट्टन का राजा क्रूर कंठीरव, तंजावर का राजा वौर विजयराघव, तंजी का राजा प्रौढ़ वेंकटनायक, मदुरई का राजा घमंडी त्रिमलनायक, पीलूगंडा का राजा उनमुक्त वेंकटप्पा, विद्यानगर का राजा जिद्दी श्रीरंगराजा, हंसकूट का राजा प्रसिद्ध तम्मगौड़ा इनको और अन्य राजाओं को शाहजी ने अपने पराक्रम से अधीन करके सेनापति रणदुल्लाखान को संतुष्ट किया।
फिर रात दिन वीरों का संहार करने वाले शाहजी ने युद्ध करके युद्ध निपुण किपगौंडा के पास से अतिशय रमणीय बेंगलुरु नाम का शहर छिन लिया। रणदुल्लाखान ने भी शाहजी को पारितोषिक के रूप में वह नगर दे दिया और फिर उसी जगह वह विजय राजा रहने लगा।
उस नगर की सीमा एवं नगर द्वार मजबूत थे। सफेदी से सफेद किए हुए महल के शिखर पर स्थित पताका गगन भेदी थी और वह महल सभी प्रकार के शिल्पकलाओं से परिपूर्ण रमणीय हवेलियों से व्याप्त था, पक्षी गृह में बैठे हुए असंख्य कबूतर वहां घूमते थे, खिड़की से उड़ने वाले मोरों की केका आवाज से वह महल मनोहर था, विस्तीर्ण दुकानों में बेचने के लिए वस्तुएं रखी गई थी, वहां प्रत्येक घर में कुएं और उस शहर में सुंदर एवं विस्तीर्ण बावड़ियां थी, उसी प्रकार वहां अनेक चौक थे और उनमें स्थित फव्वारों से पानी उड़ता था, गृह उद्यान के विकसित पेड़ों की छाया से भूमि आच्छादित थी, महल की दीवार पर चित्रित उत्कृष्ट चित्रों से लोगों की आंखें लुब्ध हो जाया करती थी, अनेक प्रकार के रंगों से युक्त पत्थरों से बांधी हुई सुंदर अश्वशाला थी, बड़े-बड़े नगर द्वारों के शिखर पाषाणों से सुशोभित थे, महल के मस्तक पर रखे हुए तोपों से वह अत्यंत दुर्गम हो गया था, युद्ध में निपुण सेना के समूह ने उसकी रक्षा की थी, चारों ओर गहरे पानी की खाइयों से वह सुशोभित दिख रहा था, अपार समुद्र के समान विस्तीर्ण तालाब से वह शोभित हो रहा था, वहां वायु के वेग से हिलने डुलने वाली लताओं युक्त सुंदर बगीचे थे, मेरुपर्वत के समान मंदिरों से वह शहर मंडित था, इस प्रकार उस नगर में निवास करने वाला इंद्र जैसा वह नृपश्रेष्ठ अपने परिजनों के साथ आनंद को प्राप्त कर रहा था।
कभी नृत्यांगनाओं के नृत्य के दर्शन से आनंदित होकर तो कभी अनेक प्रकार के शरसंधान की शिक्षा से, कभी शस्त्रागार में रखे हुए, शत्रों को देखने से, कभी अपनी सेना के लिए सैनिकों की सैन्य परीक्षा से, कभी फुलों से सुगंधित नगर के उद्यान में भ्रमण से, कभी सुंदर खियों के साथ शृंगार रस के आस्वादन से और कभी योगशास्त्र में कथित पद्धति वाली योग मुद्रा से, इस प्रकार वह राजा सभी प्रकार का उपभोग करते हुए अपने समय को व्यतीत कर रहा था।
शाहजी की अनेक पत्नियां थी किंतु जो संभाजी और शिवाजी की मां एवं यादवराज की पुत्री थी, उसने अपने पति के शुद्ध हृदय में स्थान प्राप्त कर लिया था।
जैसे बलराम और श्रीकृष्ण के संयोग से वसुदेव प्रतिदिन सुशोभित होता था वैसे ही शिवाजी और संभाजी के संयोग से शहाजी सुशोभित हो रहा था।
संभाजी से आयु में छोटे किंतु गुणों में बड़े अपने पुत्र शिवाजी से शहाजीराजे अत्यंत प्रेम करते थे।
जब पुत्र शिवाजी का जन्म हुआ, तब से ही शाहजीराजे के सभी ऐश्वर्य वृद्धि को प्राप्त होते गए।
मंदार पर्वत के समान सुंदर, कमल की शोभा को जिसने जीत लिया है, जिसके गंडस्थल से मदजल नीचे गिर रहा है ऐसे अनेक हाथी उसके द्वार पर खड़े थे।
वायु की तरह वेगवान और युद्ध में अडिग रहने वाले हजारों घोड़े आके अधशाला में विद्यमान थे।
उसके सन्तोष के साथ साथ उसका क्रोध भी प्रतिदिन अत्यधिक बढ़ने लगा एवं उसके साथ प्रताप एवं प्रभाव भी प्रतिदिन अतिशय वृद्धि को प्राप्त होने लगे।
दुर्जेय किले भी उसके लिए सुलभ होने लगे, उसका सर्वदा ही विजय होने लगा और सपने में भी उसकी पराजय नहीं होती थी।
फल, फूल एवं धान्यों की वृद्धि होने लगी और साधनों के बिना ही उसके सारे मनोरथ सिद्धि को प्राप्त होने लगे।
इस प्रकार विष्णु रूपी पुत्र के संयोग से वृद्धि को प्राप्त हुआ मालोजी का पुत्र शाहजी अपने पुत्र को देखकर अत्यंत आनंदित होने लगा।
फिर उस गुणवान पुत्र को सात वर्ष का हुआ देखा तो, वह अक्षर ज्ञान प्राप्त करने के लिए योग्य है ऐसा राजा को प्रतीत होने लगा।
मंत्रियों के सम वयस्क पुत्रों के साथ बुद्धिमान एवं स्पष्ट उच्चारण करने वाले उस पुत्र को गुरु के गोद में बिठाया।
गुरुजी, जब उसको पहला अक्षर लिखने के लिए बोलते थे तो उसके साथ वह दूसरे अक्षर को भी लिखकर दिखा देता था।
सर्व विद्याओं का जो द्वार है ऐसे मुलाक्षरों को गुरुजी ने उसको उत्तम रीति से पढ़ा दिए थे।
तब स्वभाव से बुद्धिमान, अच्छे स्वभाव वाला और अनुपम प्रभाव से युक्त शाहजी के पुत्र को सभी विद्यार्थियों के बीच इतने जल्द मुलाक्षरों सिखा हुआ जानकर गुरु को अत्यंत अभिमान हुआ और यह कुछ विलक्षण बालक है ऐसी उसके प्रति पहचान बना ली।
Krishjan
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