दुर्ग्रहाण्यपि दुर्गाणि सुग्रहत्वं प्रपेदिरे।
विजयस्सर्वदैवासीत् स्वप्नेऽपि न पराभवः ।।
दुर्जेय किले भी उसके लिए सुलभ होने लगे, उसका सर्वदा ही विजय होने लगा और सपने में भी उसकी पराजय नहीं होती थी।
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