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शिवभारतम् • अध्याय 9 • श्लोक 40
तमथ सहजमेधाशालिनं सुस्वभावं। नृपमृगपतिशावं वागगम्यानुभावम्। गुरुपचितचित्तः शिक्षितानां समूहे। द्रुतधृतलिपिविञ्च वीक्ष्य वैलक्ष्यमेहे।। इत्यनुपुराणे निवासकरपरमानन्दप्रकाशितायां संहिताया नवमोऽध्यायः ।।
तब स्वभाव से बुद्धिमान, अच्छे स्वभाव वाला और अनुपम प्रभाव से युक्त शाहजी के पुत्र को सभी विद्यार्थियों के बीच इतने जल्द मुलाक्षरों सिखा हुआ जानकर गुरु को अत्यंत अभिमान हुआ और यह कुछ विलक्षण बालक है ऐसी उसके प्रति पहचान बना ली।
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