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शिवभारतम् • अध्याय 9 • श्लोक 25
कदाचिन्नर्तकीनृत्यदर्शनोत्सवंलीलया। कदाचिन्नैकविधया शरसन्धानशिक्षया ।। कदाचिदायुधागारविन्यस्तायुधवीक्षया। कदाचिदात्मसंग्राह्यतत्तत्सैन्यपरीक्षया।। कदाचित् पुष्पितोद्दामनगरोद्यानयात्रया। कदाचित् सारसाक्षीभिः शृङ्गाररसदीक्षया।। कदाचिद्योगशास्रोक्तकलया योगमुद्रया। प्रभुस्तत्तद्रसमयं समयं समनीनयत्।।
कभी नृत्यांगनाओं के नृत्य के दर्शन से आनंदित होकर तो कभी अनेक प्रकार के शरसंधान की शिक्षा से, कभी शस्त्रागार में रखे हुए, शत्रों को देखने से, कभी अपनी सेना के लिए सैनिकों की सैन्य परीक्षा से, कभी फुलों से सुगंधित नगर के उद्यान में भ्रमण से, कभी सुंदर खियों के साथ शृंगार रस के आस्वादन से और कभी योगशास्त्र में कथित पद्धति वाली योग मुद्रा से, इस प्रकार वह राजा सभी प्रकार का उपभोग करते हुए अपने समय को व्यतीत कर रहा था।
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