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शिवभारतम् • अध्याय 9 • श्लोक 24
अथ तस्मिन् पुरवरे पटुप्राकारगोपुरे। सुधावदातसौधाग्रपताकाल्लिखिताम्बरे ॥ तत्तत्कारुकलाकीर्णरम्र्म्यहम्र्म्यमयान्तरे। विटङ्कस्थितबहिष्ठपारावतकृतस्वरे।। वातायनोत्पतन्नीलकण्ठकूजितपूतिते। विस्तीर्णापणविन्यस्तपण्यवस्तुसमन्विते।। प्रतिसद्योल्लसत्कूपे विकसद्दीर्घदीर्घिके। नैकशृंगाटकोदञ्चज्जलयन्त्रोच्छल्लज्जले ।। प्रफुल्लनिष्कुटकुटच्छायच्छन्नमहीतले। भित्तिविन्यस्तसच्चित्रलुभ्यल्लोकविलोचने।। नानावर्णाश्मसम्बद्धस्निग्धसुन्दरमदुरे। विसङ्कटपुरद्वारकूटकुट्टिममपण्डिते ।। चयाट्टमस्तकन्यस्तनालायन्त्रसुदुर्गमे। समीक निपुणानीकप्रकरप्रतिपालिते ।। समन्तादतलस्पर्शपरिखावारिभासुरे। अपारसागराकारकासारपरिशीलिते ।। अनिलोल्लासितलताललितोद्यानमण्डले । कनकाचलर्सकाशदेवतायतनाञ्चिते ।। संवसन् वासवसमः स एष नृपसत्तमः। निजैः परिजनैः सार्धं विविधं मुदमाददे।। स कदाचिन्मृगयया कदाचित् साधुसेवया। कदाचिदर्चया शम्भोः कदाचित् काव्यचर्चया ।।
उस नगर की सीमा एवं नगर द्वार मजबूत थे। सफेदी से सफेद किए हुए महल के शिखर पर स्थित पताका गगन भेदी थी और वह महल सभी प्रकार के शिल्पकलाओं से परिपूर्ण रमणीय हवेलियों से व्याप्त था, पक्षी गृह में बैठे हुए असंख्य कबूतर वहां घूमते थे, खिड़की से उड़ने वाले मोरों की केका आवाज से वह महल मनोहर था, विस्तीर्ण दुकानों में बेचने के लिए वस्तुएं रखी गई थी, वहां प्रत्येक घर में कुएं और उस शहर में सुंदर एवं विस्तीर्ण बावड़ियां थी, उसी प्रकार वहां अनेक चौक थे और उनमें स्थित फव्वारों से पानी उड़ता था, गृह उद्यान के विकसित पेड़ों की छाया से भूमि आच्छादित थी, महल की दीवार पर चित्रित उत्कृष्ट चित्रों से लोगों की आंखें लुब्ध हो जाया करती थी, अनेक प्रकार के रंगों से युक्त पत्थरों से बांधी हुई सुंदर अश्वशाला थी, बड़े-बड़े नगर द्वारों के शिखर पाषाणों से सुशोभित थे, महल के मस्तक पर रखे हुए तोपों से वह अत्यंत दुर्गम हो गया था, युद्ध में निपुण सेना के समूह ने उसकी रक्षा की थी, चारों ओर गहरे पानी की खाइयों से वह सुशोभित दिख रहा था, अपार समुद्र के समान विस्तीर्ण तालाब से वह शोभित हो रहा था, वहां वायु के वेग से हिलने डुलने वाली लताओं युक्त सुंदर बगीचे थे, मेरुपर्वत के समान मंदिरों से वह शहर मंडित था, इस प्रकार उस नगर में निवास करने वाला इंद्र जैसा वह नृपश्रेष्ठ अपने परिजनों के साथ आनंद को प्राप्त कर रहा था।
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