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शिवभारतम् • अध्याय 9 • श्लोक 10
धूर्जटिरुवाच - अतीव दुर्जयो लोके दिल्लीन्द्रोऽसौ महाद्युतिः। तस्मादायोधनावेशात् विरम त्वं महामते ।। यदनेन पुरा चीर्ण तपस्तीत्रं दुरात्मना। तद्यावदस्त्यसौ तावन्न विनाशमुपैष्यति।। सर्वेऽपि यवनास्तात पूर्वदेवान्वया इमे। देवांश्च भूमिदेवांच विद्विषन्ति पदे पदे ।। यो हन्तुं यवनानेतानेतां भुवमवातरत्‌ । स एष भगवान् विष्णुः शिवसंज्ञः शिशुस्तव ।। करिष्यत्यचिरेणैव तदेतत्वच्चिकीर्षितम्। तस्मादनेहसं कञ्चित् प्रतीक्षस्व महाभुज।।
शंकर बोले - यह महातेजस्वी दिल्लीपति पृथ्वी पर अजेय है, इसलिए हे बुद्धिमान राजा! तुम इस युद्ध कार्य से ठहर जाओ। इस दुराचारी ने पहले की हुई तीव्र तपस्या के समाप्त होने तक इसका नाश नहीं होगा। तात! ये सभी यवन वंशी हैं और वे देव एवं ब्राह्मणों से पग-पग पर द्वेष करते हैं। इन यवनों का विनाश करने के लिए जो पृथ्वी पर अवतरित हुआ है वह भगवान विष्णु, शिव नामधारी तेरा बेटा है। वह तेरे इष्टकार्य को शीघ्र ही पूर्ण करेगा इसलिए हे महाबलशाली! तुम कुछ समय प्रतीक्षा करो।
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