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अध्याय 2 — विषयनिन्दा
प्रबोधसुधाकर
22 श्लोक • केवल अनुवाद
अविचारी लोग इस विषयभोगजनित मांसपिण्ड को व्यर्थ ही धोते-पोंछते हैं। आखिर दुर्भाग्यरूप वर्षा से एक दिन यह देहरूप घर गिर ही जाता है।
जो स्त्री कुरूपा होती है उससे तो पुरुषों का चित्त कुढ़ा करता है और जो अत्यन्त रूपवती होती है वह परपुरुषों के चंगुल में फंस जाती है।
मित्र, सेवक अथवा भिक्षुक कोई भी परपुरुष क्यों न हो अति अद्भुत रूपवती स्त्री को वह चाहभरी दृष्टि से देखने ही लगता है।
जिस प्रकार पुरुष रूपवती स्त्री की ताक में रहता है उसी प्रकार क्या मृगलोचना स्त्री अपने पति से अधिक रूपवान् पुरुष को देखकर उसे मन-ही-मन नहीं ढूंढा करती?
इस प्रकार रूपवती स्त्री का पति क्षण-क्षण में ईर्ष्या से क्षीण होता हुआ जरा भी चैन नहीं पाता; जेसे बहुत-से कौवों में पड़ी हुई बलि को एक कौवा नहीं पा सकता।
स्त्री अत्यन्त बुद्धिहीना होती है। वह यदि अपनी (पति की) आज्ञा का उल्लंघन करके चलने लगे तो शत्रु से भी बढ़कर है; फिर उसके परपुरुष की इच्छा करने वाली होने पर तो कहना ही क्या है!
"पुत्रहीन को शुभलोक की प्राप्ति नहीं हो सकती" इस श्रुति में 'लोक' शब्द से क्या कहा गया है? मुक्ति, संसार या इन दोनों से भिन्न कोई और लोक? इनमें पहला पक्ष तो हो नहीं सकता,
क्योंकि प्रायः सभी मनुष्य पुत्रवान् हैं; अतः उनकी मुक्ति हो जाने पर संसार ही नहीं रहेगा (सारा जगत् शून्यप्राय हो जायगा)। इसके सिवा (मुक्ति के साधक) शास्त्रश्रवणादि उपाय भी मिथ्या हो जायेंगे। तीसरा पक्ष भी सम्भव नहीं है, क्योंकि उन (स्वर्गादि लोकों) की प्राप्ति के तो अन्य (यज्ञादि) उपाय भी हैं।
(अतः इन दो पक्षो का निराकरण हो जाने से इस शब्द का तत्पर्य दसरे पक्ष (संसार) में ही है किन्तु इस) द्वितीय पक्ष में भी यह वेदवाक्य पुत्रहीन पुरुषों की पुत्रेष्टि आदि यज्ञों में प्रवृत्ति कराने के लिये ही है।
नाना प्रकार के शारीरिक कष्ट और धन इत्यादि के व्यय से तो पुत्र उत्पन्न होता है और उत्पन्न होने पर भी उसके जीवित रहने की बड़ी चिन्ता लगी रहती है।
जीवित रहने पर भी न जाने वह मूर्ख, बुद्धिमान, सुशील, जार, चोर, चुगलखोर, पतित, जुआरी या क्रूर कैसी प्रकृति का निकले।
माता, पिता और बन्धुओं का घात करने वाला पुत्र सदैव उनके चित्त को दुःखित करने वाला ही होता है। वह धन एवं धरती के आधिपत्य के लिये सदा अपने पिता के मरण का ही चिन्तन करता रहता है।
सर्व-गुण-सम्पन्न पुत्र तो कभी कहीं किसी के होता है; वह भी यदि अल्पायु, रोगी अथवा पुत्रहीन हुआ तो दुख का ही कारण होता है।
पुत्र से सद्गति होती है - यह सर्वथा युक्ति-विरुद्ध है। (हम तो समझते हैं) इस प्रकार मूढ़ लोग शारीरिक कष्ट उठाकर दुःखों को ही मोल लेते हैं।
नाना योनियों में भ्रमण करते हुए पिता, माता, भाई, बहिन, पितृब्य और जामाता आदि सम्बन्धियों का मेल मार्ग में ठहरे हुए पथिको के संयोग के समान क्षणभर के लिये ही होता हैं।
जब तक दैव अनुकूल रहता है और परोपकार की अधिकता होती है तभी तक सब सगे-सम्बन्धी होते हैं, उनमें अन्तर पड़ा कि वे उलटे अपने शत्रु हो जाते हैं।
यदि वे नित्यप्रति नाना प्रकार के पदार्थ खाते रहते हैं, तो खूब तृप्त होकर बन्दीजन की भाँति बड़ाई करते हैं, उनमें यदि दो-तीन दिन का भी अन्तर पड़ जाय तो वे (प्रशंसा करने वाले) ही कुवाक्य कहते हुए कोप करने लगते हैं।
इस दुर्भर (कठिनता से भरे जाने योग्य) पेट के लिये चित्त लाखों रुपये तक बहुत-सा धन कमाने को प्रवृत्त होता है, तथापि बिना प्रारब्ध के एक कानी कौड़ी भी नहीं मिलती।
यदि अधिक धन मिल भी जाय तो उससे स्त्री आदि का ही स्वार्थ-साधन होता है, तथा राजा और चोरों से भी अनर्थ की अशंका रहती है; इसलिये धन के लिये प्रयत्न करना व्यर्थ ही है।
राजा (द्रव्यहरण की इच्छा से) धनी पुरुषो के अन्याय की ताक में रहता है। चोर उसके मार्ग में जाने की प्रतीक्षा किया करता है। दुष्ट परुष उसे विपत्ति में पड़ा देखना चाहते हैं और उसके उत्तराधिकारियों की दृष्टि सदा कल्ह पर रहती है।
राजा लोग नाना प्रकार के पाप-कर्मो से धन को इकट्ठा करते हैं और फिर वह धन हाथी-घोड़ों के लिये क्षण-क्षण में नष्ट किया जाता हैं।
राजा लोग अन्य राजारओं के आक्रमण से, युद्ध में पराजय से, मन्त्री और सेवकादि के षड्यन्त्रों से तथा विष अथवा शस्त्रो के द्वारा गुप्तघात आदि से (शंकितचित्त रहकर) सदा ही चिन्तासागर में डूबे रहते हैं।
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