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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 2 • श्लोक 19
लब्धश्चेदधिकोऽर्थः पत्न्यादीनां भवेत्स्वार्थः । नृपचौरतोऽप्यनर्थस्तस्मादृव्योद्यमो व्यर्थः ॥
यदि अधिक धन मिल भी जाय तो उससे स्त्री आदि का ही स्वार्थ-साधन होता है, तथा राजा और चोरों से भी अनर्थ की अशंका रहती है; इसलिये धन के लिये प्रयत्न करना व्यर्थ ही है।
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