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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 2 • श्लोक 8
सर्वेऽपि पुत्रभाजस्तन्मुक्तौ संसृतिर्भवति । श्रवणादयोऽप्युपाया मृषा भवेयुस्तृतीयेऽपि ॥
क्योंकि प्रायः सभी मनुष्य पुत्रवान्‌ हैं; अतः उनकी मुक्ति हो जाने पर संसार ही नहीं रहेगा (सारा जगत्‌ शून्यप्राय हो जायगा)। इसके सिवा (मुक्ति के साधक) शास्त्रश्रवणादि उपाय भी मिथ्या हो जायेंगे। तीसरा पक्ष भी सम्भव नहीं है, क्योंकि उन (स्वर्गादि लोकों) की प्राप्ति के तो अन्य (यज्ञादि) उपाय भी हैं।
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