"पुत्रहीन को शुभलोक की प्राप्ति नहीं हो सकती" इस श्रुति में 'लोक' शब्द से क्या कहा गया है? मुक्ति, संसार या इन दोनों से भिन्न कोई और लोक? इनमें पहला पक्ष तो हो नहीं सकता,
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