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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 2 • श्लोक 3
यः कश्चित्परपुरुषो म्त्रं भृत्योऽथवा भिक्षुः । पश्यति हि साभिलाषं विलक्षणोदाररूपवतीम् ॥
मित्र, सेवक अथवा भिक्षुक कोई भी परपुरुष क्‍यों न हो अति अद्भुत रूपवती स्त्री को वह चाहभरी दृष्टि से देखने ही लगता है।
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