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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 2 • श्लोक 6
वनिता नितान्तमज्ञा स्वाज्ञामुल्लङ्घ्य वर्तते यदि सा । शत्रोरप्यधिकतरा परभिलाषिण्यसौ किमुत ॥
स्त्री अत्यन्त बुद्धिहीना होती है। वह यदि अपनी (पति की) आज्ञा का उल्लंघन करके चलने लगे तो शत्रु से भी बढ़कर है; फिर उसके परपुरुष की इच्छा करने वाली होने पर तो कहना ही क्‍या है!
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