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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 2 • श्लोक 21
पातकभरैरनेकैरर्थं समुपार्जयन्ति राजानः । अश्वमतङ्गजहेतोः प्रतिक्षणं नाश्यते सोऽर्थः ॥
राजा लोग नाना प्रकार के पाप-कर्मो से धन को इकट्ठा करते हैं और फिर वह धन हाथी-घोड़ों के लिये क्षण-क्षण में नष्ट किया जाता हैं।
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