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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 2 • श्लोक 18
दुर्भरजठरनिमित्तं समुपार्जयितुं प्रवर्तते चित्तम् । लक्षावधि बहुवित्तं तथाप्यलभ्यं कपर्दिकामात्रम् ॥
इस दुर्भर (कठिनता से भरे जाने योग्य) पेट के लिये चित्त लाखों रुपये तक बहुत-सा धन कमाने को प्रवृत्त होता है, तथापि बिना प्रारब्ध के एक कानी कौड़ी भी नहीं मिलती।
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