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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 2 • श्लोक 20
अन्यायमर्थभाजं पश्यति भूपोऽध्वगामिनं चौरः । पिशुनो व्यसनप्राप्तिं दायादानां गणः कलहम् ॥
राजा (द्रव्यहरण की इच्छा से) धनी पुरुषो के अन्याय की ताक में रहता है। चोर उसके मार्ग में जाने की प्रतीक्षा किया करता है। दुष्ट परुष उसे विपत्ति में पड़ा देखना चाहते हैं और उसके उत्तराधिकारियों की दृष्टि सदा कल्ह पर रहती है।
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