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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 2 • श्लोक 15
पितृमातृबन्धुभगिनीपितृव्यजामातृमुख्यानाम् । मार्गस्थानामिव युतिरनेकयोनिभ्रमात्क्षणिका ॥
नाना योनियों में भ्रमण करते हुए पिता, माता, भाई, बहिन, पितृब्य और जामाता आदि सम्बन्धियों का मेल मार्ग में ठहरे हुए पथिको के संयोग के समान क्षणभर के लिये ही होता हैं।
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