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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 2 • श्लोक 16
दैवं यावद्विपुलं यावत्प्रचुरः परोपकारश्च । तावत्सर्वे सुहृदो व्यत्ययतः शत्रवः सर्वे ॥
जब तक दैव अनुकूल रहता है और परोपकार की अधिकता होती है तभी तक सब सगे-सम्बन्धी होते हैं, उनमें अन्तर पड़ा कि वे उलटे अपने शत्रु हो जाते हैं।
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