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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 2 • श्लोक 1
मूढः कुरुते विषयजकर्दमसंमार्जनं मिथ्या । दुरदृष्टवृष्टिविरसो देहो गेहं पतत्येव ॥
अविचारी लोग इस विषयभोगजनित मांसपिण्ड को व्यर्थ ही धोते-पोंछते हैं। आखिर दुर्भाग्यरूप वर्षा से एक दिन यह देहरूप घर गिर ही जाता है।
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